DesiBees

Full Version: कामुक-कहानियाँ
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शेखर को और हिम्मत मिली और इस बार
उसने थोड़ा और ज़ोर लगाया। उधर प्रगति ने भी अपनी गांड को ढीला करते हुए पीछे
की तरफ ज़ोर लगाया। अचानक शेखर का लंड करीब एक इंच अन्दर चला गया। पर इस
बार प्रगति की चीख निकल गई। इतनी तैयारी करने के बाद भी शेखर के लंड के
प्रवेश ने प्रगति को हिला दिया।





शेखर को चिंता हुई तो प्रगति ने कहा- अब मत रुकना।





शेखर ने लंड का जो हिस्सा बाहर था उस पर और जेली लगाई और लंड को थोड़ा सा बाहर खींच कर एक और ज़ोर लगाया।





प्रगति ने भी पीछे के तरफ ज़ोर लगाया और शेखर का लंड लगभग पूरी तरह अन्दर
चला गया। प्रगति थोड़ा सा हिली पर फिर संभल गई। शेखर से ज़्यादा प्रगति के
कारण उन्हें यह सफलता मिली थी।







अब शेखर को अचानक अपनी सफलता का अहसास हुआ। उसका लंड इतनी टाइट सुरंग में
होगा उसको अंदाजा नहीं था। उसे बहुत मज़ा आ रहा था। ख़ुशी के कारण उसका लंड
शायद और भी फूल रहा था जिस से उसकी टाइट गांड और भी टाइट लग रही थी।







थोड़ी देर इस तरह रुकने के बाद उसने अपने लंड को हरकत देनी शुरू की। उसका
लंड तो चूत का आदि था जिसमें अन्दर बाहर करना आसान होता है। गांड की और बात
है। इस टाइट गुफा में जब उसने लंड बाहर करने की कोशिश की तो ऐसा लगा मानो
प्रगति की गांड लंड को अपने से बाहर जाने ही नहीं देना चाहती। फिर भी शेखर
ने थोड़ा लंड बाहर निकाला और जितना बाहर निकला उस हिस्से पर जेली और लगा ली।
अब धीरे धीरे उसने अन्दर बाहर करना शुरू किया। बाहर करते वक़्त थोड़ा तेज़
और अन्दर करते वक़्त धीरे-धीरे की रफ्तार रखने लगा।





उसने प्रगति से पूछा- कैसा लग रहा है?







तो प्रगति ने बहुत ख़ुशी ज़ाहिर की। उसे वाकई बहुत मज़ा आ रहा था। उसने शेखर
को और ज़ोर से चोदने के लिए कहा। शेखर ने अपनी गति बढ़ा दी और उसका लंड लगभग
पूरा अन्दर बाहर होने लगा।







शेखर की तेज़ गति के कारण एक बार उसका लंड पूरा ही बाहर आ गया। अब वह इतनी
आसानी से अन्दर नहीं जा रहा था जितना चूत में चला जाता है। उसने फिर से
गांड में और लंड पर जेली लगाई और फिर पूरी सावधानी से लंड को अन्दर डाला।
एक बार फिर प्रगति की आह निकली पर लंड अन्दर जा चुका था। शेखर ने फिर से
चोदना शुरू किया। उसके लंड को गांड की कसावट बहुत अच्छी लग रही थी और उसे
प्रगति के पिछले शरीर का नज़ारा भी बहुत अच्छा लग रहा था।







अब उसने प्रगति को आगे की ओर धक्का देते हुए बिस्तर पर सपाट लिटा दिया। वह
भी उसके ऊपर सपाट लेट गया। प्रगति पूरी बिस्तर पर फैली हुई थी। उसकी टांगें
और बाजू खुले हुए थे और उसके चूतड़ नीचे रखे तकिये के कारण ऊपर को उठे हुए
थे। शेखर का पूरा शरीर उसके पूरे शरीर को छू रहा था। सिर्फ चोदने के लिए
वह अपने कूल्हों को ऊपर नीचे करता था और उस वक़्त उनके इन हिस्सों का
संपर्क टूटता था। शेखर ने अपने हाथ सरका कर प्रगति के बदन के नीचे करते हुए
दोनों तरफ से उसके मम्मे पकड़ लिए। शेखर का पूरा बदन कामाग्नि में लिप्त था
और उसने इतना ज्यादा सुख कभी नहीं भोगा था। उधर प्रगति ने भी इतना आनंद
कभी नहीं उठाया था। उसके नितम्ब रह-रह कर शेखर के निचले प्रहार को मिलने के
लिए ऊपर उठ जाते थे जिससे लंड का समावेश पूरी तरह उसकी गांड में हो रहा
था। दोनों सातवें आसमान पर पहुँच गए थे।







अब शेखर चरमोत्कर्ष पर पहुँचने वाला था। उसके मुंह से मादक आवाजें निकलने
लगी थी। प्रगति भी अजीब आवाजें निकल रही थी। शेखर ने गति तेज़ करते हुए एक
बार लंड लगभग पूरा बाहर निकाल कर एक ही वार में पूरा अन्दर घुसेड़ दिया,
प्रगति की ख़ुशी की चीख के साथ शेखर की दहाड़ निकली और शेखर का वीर्य फूट
फूट कर उसकी गांड में निकल पड़ा। प्रगति ने अपनी गांड ऊपर की तरफ दबा कर
उसके लंड को जितनी देर अन्दर रख सकती थी रखा। थोड़ी देर में शेखर का लंड
स्वतः बाहर निकल गया और प्रगति की पीठ पर निढाल पड़ गया।







दोनों की साँसें तेज़ चल रही थी और दोनों पूर्ण तृप्त थे। शेखर ने प्रगति
को उठा कर अपने सीने से लगा लिया। उसके पूरे चेहरे पर चुम्बन की वर्षा कर
दी और कृतज्ञ आँखों से उसे निहारने लगा।







प्रगति ने भी घुटनों के बल बैठ कर शेखर के लिंग को पुचकारा और और धन्यवाद
के रूप में उसको अपने मुँह में ले कर चूसने लगी। उसकी आँखों में भी
कृतज्ञता के आँसू थे। दोनों एक बार फिर आलिंगनबद्ध होते हुए बाथरूम की तरफ
चले गए।
दीदी, जीजाजी और पारो
मेरे परिवार में मैं, पिताजी,
माताजी और मुझ से तीन साल बड़ी दीदी हैं, जिनका नाम है शालिनी। मैं और दीदी
एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। भाई-बहन से अधिक हम दोस्त हैं। हम
एक-दूसरे की निजी बातें जानते हैं और मुश्किल में राय भी लेते-देते हैं।
सेक्स के बारे में हम काफ़ी खुले विचार के हैं। हालाँकि हमने आपस में चुदाई
नहीं की है। जब मैं छोटा था तो वह अक्सर मुझे नहलाती थी। उस वक़्त मात्र
कौतूहल से दीदी मेरे लौड़े के साथ खेला करती थी। मुझे गुदगुदी होती थी और
लौड़ा कड़ा हो जाता था। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई तैसे-तैसे हमारी छेड़-छाड़
बढ़ती चली गई। तब मैं अट्ठारह साल का था और वो इक्कीस साल की। तब तक मैंने
उसकी चूचियाँ देख लीं थीं, भोस देख ली थी और उसने मेरा लंड हाथ में लेकर
मूठ मार दिया था। चुदाई क्या है, कैसे की जाती है, क्यूँ की जाती है, यह सब
मुझे उसी ने सिखाया था।

कहानी शुरु होती है शालिनी की शादी से। पिताजी ने बड़ी धूम-धाम से उसकी
शादी की। बारात दो दिनों की मेहमान रही। खाना-पीना, गाना-बजाना सब दो दिनों
तक चला। जीजाजी शैलेश कुमार उस वक्त तेईस साल के थे और बहुत ख़ूबसूरत थे।
दीदी भी कुछ कम नहीं थी। लोग कहते थे कि बड़ी सुन्दर जोड़ी है।

बारात में एक लड़की थी- पारुल, जीजू की छोटी बहन यानि दीदी की ननद। भाई-बहन
भी एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। पारो पाँच फुट लम्बी, गोरी और पतली
थी। गोल चेहरे पर काली-काली बड़ी आँखें थीं। बाल काल और लम्बे थे। कमर पतली
थी और नितम्ब भारी थे। कबूतर की जोड़ी जैसे छोटे-छोटे स्तन सीने पर लगे
हुए थे। मेरी तरह वो भी बचपन से निकल कर जवानी में क़दम रख रही थी।

क्या हुआ, कुछ पता नहीं, लेकिन पहले दिन से ही पारो मुझसे नाराज़ थी। जब भी
मुझसे मिलती तब डोरे निकालती और हुँह -- कहकर मुँह बिचका कर चली जाती थी।
एक बार मुझे अकेले में मिली और बोली: तू रोहित है ना? पता है? मेरे भैया
तेरी बहन की फाड़ कर रख देंगे।

ऐसी बेहूदी बात सुनकर मुझे गुस्सा आ गया। भला कौन दूल्हा अपनी दुल्हन की
झिल्ली तोड़े बिना रहता है? अपने आप पर नियंत्रण रख कर मैंने कहा: तू भी एक
लड़की है ना, एक ना एक दिन तेरी भी कोई फाड़ देगा।

वह मुँह लटकाए वहाँ से चली गई।

दीदी ससुराल से तीन दिन बाद आई। मैंने माँ को उसे कहते सुना: डरने की कोई
बात नहीं है। कभी-कभी आदमी देर लगाता है। पर सब ठीक हो जाएगा।

अकेली पाकर मैंने उससे पूछा: क्यूँ री? साजन से चुदवा कर आई हो ना? कैसा है जीजू का लंड? बहुत दर्द हुआ था पहली बार?

दीदी: कुछ नहीं हुआ है रोहित। वो पारुल अपने भैया से छूटती नहीं, रोज़
हमारे साथ सोती है। तेरे जीजू ने एक बार अलग कमरे में सोने को कहा तो रोने
लगी और हंगामा मचा दिया।

मैं समझ गया। दीदी चुदवाए बिना आई थी। पाँच-सात दिनों के बाद वह पुनः
ससुराल चली गई और एक महीने के बाद आई। अबकी बार उसे देख कर मेरा दिल डूब
गया। उसके चेहरे पर से नूर उड़ गया था। कम से कम पाँच किलो वज़न घट गया था।
आँखों के आसपास काले धब्बे पड़ गए ते। उसका हाल देखकर माँ रो पड़ी। दीदी
ने मुझे बताया कि वो अब भी कुँवारी थी। जीजू ने एक बार भी नहीं चोदा था।

मैंने पूछा: जीजू का लंड तो ठीक है ना? खड़ा होता है या नहीं?

दीदी: वो तो ठीक है, नहाते वक्त देखा है मैंने। रात को मौक़ा नहीं मिलता।

मैं: हनीमून पर चले जाओ ना?

दीदी: तेरे जीजू ने यह भी कोशिश की, पर वो भी साथ चलने पर अड़ गई।

मैं: सच कहूँ? तेरी उस ननद को चाहिए एक मोटा-तगड़ा लंड। एक बार चुदवाएगी तो शांत हो जाएगी।

दीदी: तेरे जीजू भी यही चाहते हैं। लेकिन कौन चोदेगा उसे?

मैंने शरारत से कहा: मैं चोद लूँ?

दीदी हँस पड़ी: तू क्या चोदेगा? तेरी तो नुन्नी है, चोदने के लिए लंड चाहिए।

मैंने पाजामा खोल कर मेरा लौड़ा दिखाया और कहा: ये देख, नुन्नी लगती है तुझे? कहे तो अभी खड़ा कर दूँ। देखना है?

दीदी: ना बाबा ना। सलामत रहे तेरा लंड।

मैं: मान लो कि मैंने पारुल को चोद भी लिया, जीजू को पता चले कि मैंने उसे चोदा है तो तुम पर गुस्सा नहीं होंगे?

दीदी: ना, वो भी उससे थक गए हैं। कहते थे कि कोई अच्छा आदमी मिल जाए तो उसे कोई हर्ज़ नहीं है पारुल की चुदाई में।

मैं: तो दीदी, मुझे तेरे घर आने दे। कोशिश करेंगे, क़ामयाब रहे तो सही, वर्ना कुछ नहीं।

दीवाली के दिन आ रहे थे। स्कूल में डेढ़ महीने की छुट्टियाँ पड़ीं। दीदी ने
जीजू से बात की होगी क्योंकि उनकी चिट्ठी आई थी पिताजी के नाम जिसमें मुझे
दीवाली मनाने अपने शहर में बुलाया था। मैं दीदी के ससुराल चला आया। मुझे
मिलकर दीदी और जीजू बहुत ख़ुश हुए। हर वक्त की तरह इस बार भी पारो हुँह कर
के चली गई।

जीजू सिविल कोर्ट में नौकरी करते थे और अपने पुरखों के मकान में रहते थे।
मकान पुराना था लेकिन तीन मंजिलों वाला बड़ा था। आस-पास दूसरे मकान जो थे
वे भी काफी पुराने थे, लेकिन खाली पड़े थे। शहर के बीच होने पर भी जीजू ने
काफी एकान्त पाया था।

यहाँ आने के पहले दिन मुझे पता चला कि जीजू के परिवार में वो और पारो दोनों
ही थे। कई साल पहले जब उनके माता-पिता का देहान्त हुआ तब पारो छोटी बच्ची
थी। उस दिन से जीजू ने पारो को अपनी बेटी की तरह से पाला-पोसा था। उस दिन
से ही पारो अपने भैया के साथ सोती थी और इतनी लगी हुई थी कि दीदी के आने पर
छूटना नहीं चाहती थी। दीदी की समस्या हल करने का कोई प्लान मैंने बनाया
नहीं था। मैं सोचता था कि क्या किया जाए। इतने में जीजू हम सब को एक छोटी
सी ट्रिप पर ले गए और मेरा काम बन गया।

शहर से करीब तीस मील दूर गलटेश्वर नाम की एक जगह है, वहीं सागर किनारे एक
सदियों पुराना शिव-मन्दिर है, आसपास काफी प्राकृतिक सुन्दरता है। बहुत सारे
लोग पिकनिक के लिए वहाँ जाते हैं। आने-जाने में लेकिन सारा दिन लग जाता
है।

मैंने एक अच्छा सा कैमरा ख़रीदा था जो मैं हमेशा अपने पास रखता था। इस
पिकनिक पर वो ख़ूब काम आया। मैंने जीजू और दीदी की कई तस्वीरें लीं। मैं
जानबूझ कर पारो की उपेक्षा करता रहा, उसके जानते हुए भी उसकी एक भी तस्वीर
नहीं ली। हाँलाकि मैंने उसकी चार तस्वीरें लीं थी जिसका उसको पता नहीं चला
था।

अचानक मेरी नज़र मन्दिर की बाहरी दीवारों पर जो शिल्प था उस पर पड़ी। मैं
देखता ही रह गया। वो शिल्प था चुदाई करते हुए युगल का। अलग-अलग पोज़ीशन में
चुदाई करती हुई पुतलियाँ इतनी सजीव थीं कि ऐसा लगे कि अभी बोल उठेगीं।
जीजू से छुपा-छुपी मैं फटाफट उन शिल्प को तस्वीर खींचने लगा। इतने में दीदी
आ गई। चुदाई करते प्रेमी के शिल्प देख वो उदास हो गई।

पारो मुझसे कतराती रही। सारा दिन इधर-उधर घूमे-फिर और शाम को घर आए।

दूसरे दिन मैंने मेरे दोस्त के स्टूडियो में फिल्म्स दे दी। डेवलप और
प्रिंट निकालने के लिए तीसरे दिन दीदी और जीजू को कुछ काम के वास्ते बाहर
जाना पड़ा, सुबह से गए रात को आने वाले थे। ट्यूशन-क्लास की वज़ह से पारो
साथ न जा सकी। दोपहर के दो बजे वो क्लास से आई। फोटो स्टूडियो रास्ते में
आता था। इसलिए वो तस्वीरें लेते आई। आते ही उसने पैकेट मेरी ओर फेंका और
रसोईघर में चली गई चाय बनाने। मैं इसके पीछे-पीछे गया। अकड़ी हुई मेरी ओर
पीठ करके वह खड़ी थी।

मैंने कहा: मेरे लिए भी चाय बनाना।

गुस्से में वो बोली: ख़ुद बना लेना। नौकर नहीं हूँ तुम्हारी।

मैंने पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा। उसने तुरन्त झिड़क दिया और बोली: दूर रहो मुझसे। छुओ मत। मुझे ऐसी हरक़तें पसन्द नहीं।

मैंने धीरे से कहा: अच्छा बाबा, माफ़ करना। लेकिन ये तो बताओ कि तुम मुझसे इतनी नाराज़ क्यों हो? क्या किया है मैंने?

पारो: अपने आप से पूछिए, क्या नहीं किया है आपने।

मैं: अच्छा बाबा, क्या नहीं किया है मैंने?

अब तक वो मुझ से मुँह फेरे खड़ी थी। पलट कर बोली: बड़े भोले बनते हो। सारी
दुनिया की तस्वीरें निकाल लेते हो। यहाँ तक कि वो मंदिर के पत्थरों भी
बाक़ी ना रहे। एक में हूँ जिसको तुम टालते रहे हो। मेरी एक भी तस्वीर नहीं
खींची तुमने। आपका क़ीमती कैमरा ख़राब हो जाएगा, इतनी बदसूरत हूँ ना मैं?

मैं: कौन कहता है कि मैंने तु्म्हारी तस्वीर नहीं खींची? भला इतनी सुन्दर लड़की पास हो और तस्वीर ना निकाले, ऐसा कौन मूर्ख होगा!

पारो: मुझे उल्लू मत बनाईए। दिखाइए मेरी फोटो।

मैं: पहले चाय पिलाओ।

उसने दोनों के लिए चाय बनाई। चाय पी कर हम मेरे कमरे में गए और तस्वीर
देखने बैठे। मैं पलंग पर बैठा था। वो मेरे बगल में आ बैठी। थोड़ी सी दूर।
उसने पतले कपड़े की फ्रॉक पहना था जिसके आर-पार अन्दर की ब्रा साफ़ दिखाई
दे रही थी। उसके बदन से मस्त खुशबू आ रही थी। सूँघ कर मेरा लौड़ा जागने
लगा।

पहले हमने दीदी और जीजू की तस्वीरें देखीं। बाद में पारो की चार तस्वीरें
निकलीं। अपनी तस्वीर देखने के लिए वो नज़दीक सरकी। मेरे कंधे पर हाथ रख वो
ऐसे बैठी की हमारी जाँघें एक-दूसरे से सट गईं, मैं मेरी पीठ पर उसके स्तन
का दबाव महसूस करने लगा। बेचारा मेरा लंड, क्या करे वो? खड़ा होकर सलामी दे
रहा था और लार टपका रहा था। बड़ी मुश्किल से मैंने उसे छुपाए रखा।

पारो की चार तस्वीरों में से तीन सीधी-सादी थी जिसमें वो हँसती हुई पकड़ी
गई थी। बड़ी प्यारी लगता थी। चौथी तस्वीर में वह नीचे झुकी हुई थी और हवा
से दुपट्टा सीने से हट गया था। उसकी चूचियाँ साफ़ दिख रहीं थीं। तस्वीर
देखकर वह शरमा गई और बोली: तुम बड़े शैतान हो।

मैं: तो ओर तस्वीर खींचने दोगी?

पारो: हाँ-हाँ लेकिन ये बाक़ी की तस्वीर किसकी है?

मैं: रहने दे। ये तस्वीरें तेरे देखने लायक नहीं है।

पारो: क्या मतलब? नंगी है क्या? देखूँ तो मैं।

इतना कहकर अचानक वो तस्वीर लेने के लिए झपटी। मैंने हाथ हटा लिया। इस
छीना-झपटी में वो गिर पड़ी मेरी बाँहों में। वो सँभल जाए इससे पहले मैंने
उसे सीने से लगा लिया। झटपट वो सँभल गई। शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया, और
उसने सिर झुका लिया। मेरे पहलू से लेकिन वो हटी नहीं। मैंने मेरा हाथ उसकी
कमर में डाल दिया। ऊँगलियाँ मलते-मलते दबी आवाज़ में वो बोली: क्यों सताते
हो? दिखाओ ना।

मेरे पास कोई चारा नहीं था। चुदाई करते हुए शिल्प की तस्वीरें मैं दिखाने
लगा। मुस्कुराती हुई दाँतों में ऊँगली चबाती हुई वो देखती रही।

अन्त में बोली: बस? यही था? ये तो कुछ नहीं है, भैया के पास एक किताब है, जिसमें सच्चे आदमी और औरतों की तस्वीरें हैं।

मैं: तुम्हें कैसे मालूम?

पारो: मैंने किताब देखी है, देखनी है तुझे?

मैं: हाँ, हाँ... ज़रूर।

खड़ी होकर वो बोली: चलो मेरे साथ।

अब समस्या यह थी कि मेरा लंड पूरा तन गया था। निकर के बावज़ूद उसने मेरे पाजामे का तम्बू बना रखा था। इस हालत में मैं कैसे चल सकूँ?

मैंने कहा: मैं बैठा हूँ, तू किताब ले आ।

वो किताब ले आई और बोली: एक दिन जब मैं भैया के कमरे की सफाई कर रही थी तब
मैंने पलंग के नीचे ये पाई। मेरे ख्याल से भाभी ने भी देखी है।

मैं: दीदी देखे या ना देखे, क्या फ़र्क पड़ेगा? तू जो उनके बीच आ रही है।

पारो: मैं उनके बीच नहीं आ रही हूँ। देख रोहित, भैया मेरे सर्वस्व हैं, और
कोई मुझसे उन्हें छीन ले, यह मैं बर्दाश्त नहीं करूँगी। चाहे वह भाभी हो या
कोई और।

मैं: अरी पगली, दीदी कहाँ जाएगी तेरे भैया को छीन लेकर? भैया के साथ वो भी तेरी हो जाएगी। कब तक तू कबाब में हड्डी बनी रहेगी?

पारो: मैं जानती हूँ।

मैं: क्या जानती हो?

पारो: कि मेरी वज़ह से भैया वो नहीं कर पाए हैं।

मैं: वो मायने क्या? मैं समझा नहीं।

पारो: ख़ूब समझते हो और भोले बन रहे हो!

वो शरमा रही थी फिर भी बोली: मज़ाक छोड़ो। देखो, मैंने भैया से सिर्फ एक चीज़ माँगी है।

मैं: वो क्या?

उसने नज़रें फेर लीं और बोली: मैंने कहा, एक बार, सिर्फ़ एक बार मुझे देखने दे।

मैं: क्या देखने दे?

पारो: शैतान, जानते हुए भी पूछते हो?

मैं: नहीं जानता मैं साफ़-साफ़ बताओ ना।

पारो: वो, वो जो हर दूल्हा-दुल्हन करते हैं सुहागरात को।

मैं: मुझे ये भी नहीं पता। क्या करते हैं?

पारो: हाय राम, चु... चु... मुझसे नहीं बोला जाता।

मैं: ओह.. .ओ... चुदाई की कह रही हो?

अपना चेहरा छुपा कर सिर हिला कर उसने हाँ कही।

मैं: तुझे दीदी और जीजू की चुदाई देखनी है एक बार, इतना ही!

उसने मुँह फेर लिया और हाँ बोली।

मैं: जीजू ने क्या कहा?

पारो: भाभी ना बोलती है।

मैं: मैं उनको समझाऊँगा। लेकिन एक ही बार, ज्यादा नहीं। और एक बात पूछूँ? उनको चोदते देखकर तुम अगर उत्तेजित हो जाओगी तो क्या करोगी?

पारो: नहीं बताऊँगी तुझे।

मैंने आगे बात ना चलाई। पलंग पर बैठ मैंने उसे पास बुला लिया। वो मेरी बगल
में आ बैठी। मैंने किताब उसके हाथ में रख दी। मेरा हाथ उसकी कमर में डाला।
उसने किताब खोली।

किताब के पहले पन्ने पर नर्म व खड़े लौड़ों के चित्र थे। देखकर पारो बोली: ऐसा ही होता है। क्या बोलें इसको? शिश्न? मैंने देखा है।

मेरा लंड ठुमके ले रहा था। मैंने कहा: इसको लौड़ा कहते हैं और इसको लंड। कहाँ देखा है तुमने?

वो फिर शरमाई और बोली: किसी को ना कहने का वचन दे।

मैं: वचन दिया।

पारो: मैंने भैया का देखा है, कैसे वो बाद में बताऊँगी।

मेरा हाथ उसकी पीठ सहलाने लगा। वो मेरे और निकट आई। हम दोनों उत्तेजित हो चले थे, लेकिन उस वक्त हमें इसका भान नहीं था।

दूसरे पन्ने पर बन्द और चौड़ी की हुई चूत की तस्वीरें थीं।

जानबूझ कर मैंने पूछा: ये भी ऐसी ही होती है क्या? क्या कहते हैं उसे?

सिर झुका कर वो बोली: भोस। ऐसी ही होती है भाभी की भी ऐसी ही होगी।

मैं: तेरी कैसी है? देखने देगी मुझे?

पारो: तुम जो तुम्हारा दिखाओ तो मैं मेरी दिखाऊँगी।

मैं खड़ा हो गया। नाड़ा खोल पाजामा उतारा और लंड को आज़ाद किया।

थोड़ी देर वो ताज्ज़ुब होकर देखती रही, फिर बोली: मैं छू सकती हूँ?

मैं: क्यों नहीं?

ऊँगलियों के नोक से उसने लंड छुआ। कोमल उँगलियों का हल्का स्पर्श पाकर लंड और कड़ा हो गया और ठुमके लेने लगा।

पारो: ये तो हिलता है।

मैं: क्यूँ नहीं? तुझे सलाम कर रहा है।

पारो: धत्त।

मैं: मुट्ठी में ले तो ज़रा।

उसने मुट्ठी से लंड पकड़ा तो ठुमक-ठुमक करके वो अधिक कड़ा हो गया।

उसकी मदहोशी बढ़ने लगी, साँसें तेज़ चलने लगी, चेहरा लाल हो गया।

वो बोली: हाय रे, इतना कड़ा क्यों हुआ है? दर्द नहीं होता ऐसे तन जाने से?

मैं: ऐसे कड़ा ना हो तो चूत में कैसे खुस सके और कैसे चोद सके?

पारो: ये तो लार भी निकालता है।

वाकई मेरा लंड अपनी लार से गीला हो चला था।

मैं: ये लार नहीं है, अपनी प्यारी चूत के लिए वो आँसू बहा रहा है।

मुट्ठी से लंड दबोच कर वो बोली: रोहित, बड़ा शैतान है तू।

मैंने उसे बाँहों में भर लिया और कहा: ऐसे-ऐसे मुठ मार।

वो डरते-डरते मुठ मारने लगी। उसके गोरे-गोरे गाल पर मैंने हल्के से चूमा और कहा: मज़ा आता है ना?

जवाब में उसने मेरे गालों पर भी चूम लिया।

मैं: अब सोच, जब ये चूत में घुसकर ऐसा करे तब कितना आनन्द आता होगा।

वो बोली: नहीं, और उसने मुट्ठी से लंड मसल डाला।

मैंने लंड छुड़ा कर कहा: अब तेरी बारी।

शरमाती हुई वो खड़ी हो गई। फ्रॉक के नीचे हाथ डाल कर कच्छी निकालने लगी। मैंने कहा: ऐसे नहीं, पलंग पर लेट जा।

वो चित्त लेट गई। शरम से नज़रें चुराकर उसने फ्रॉक ऊपर उठाया।

उसकी गोरी-गोरी चिकनी जाँघें खुली हुई देखकर मेरे लंड फनफनाने लगा। उसने
सफ़ेद पैन्टी पहनी थी। भोस के पानी से पैन्टी गीली होकर चिपक गई थी। कुल्हे
उठाकर उसने पैन्टी उतारी। तुरन्त उसने हाथ भोस से ढँक दी।

मैंने कहा: ऐसे छुपाओगी तो कैसे देख पाऊँगा?

उसकी कलाई पकड़ कर मैंने उसके हाथ हटा दिए, उसकी छोटी सी भोस मेरे सामने आई।

काले घुँघराले झाँट से ढँकी उसकी भोस छोटी थी। मोन्स उँची थी। बड़े मोटे
होंठ थे और एक दूजे से लगे हुए थे। तीन इंच लम्बी दरार चिकने पानी से गीली
हुई थी। मैंने हल्के से छुआ। तुरन्त उसने मेरा हाथ हटा दिया। मैंने कहा:
तूने मेरा लंड पकड़ा था, अब मुझे तेरी छूने दे।

मैंने फिर भोस पर हाथ रखा। उसने मेरी कलाई पकड़ ली लेकिन विरोध किया नहीं।
ऊँगलियों से बड़े होते चौड़े कर मैंने भोस का भीतरी हिस्सा देखा। किताब में
दिखाई थी, वैसी ही पारो की भोस थी। जवान कुँवारी लड़की की भोस मैं पहली
बार देखा था। छोटे होंठ नाज़ुक और पतले और साँवली रंग के थे। दरार के अगले
कोने में एक इंच लम्बी कड़ा सा भग्न था। भग्न का छोटा मत्था चेरी जैसा
दिखाई दे रहा था। दरार के पिछले हिस्से में था, चूत का मुँह जो गीला-गीला
हुआ था। मैंने ऊँगली के हल्के स्पर्श से दरार को टटोला। जैसे मैंने भग्न को
छुआ वो झटके से कूद पड़ी। मैंने चूत का मुँह छुआ और एक ऊँगली अन्दर डाली।
ऊँगली योनि-पटल तक जा पहुँची।

हम दोनों काफी उत्तेजित हो गए थे। उसने आँखें बन्द कर ली थीं। मुझे यहाँ तक
याद है कि अपनी बाँहें लम्बी कर उसने मुझे अपने बदन पर खींच लिया था। इसके
बाद क्या हुआ और कैसे हुआ वो मुझे याद नहीं। वो जब चीख पड़ी, तब मुझे होश
आया कि मैं उसके ऊपर लेटा था और मेरा लंड झिल्ली तोड़कर आधा चूत में घुस
गया था। वो मुझे धकेल कर कहने लगी: उतर जाओ, उतर जाओ, बहुत दर्द होता है।

मैंने उसके होंठ चूमे और कहा: ज़रा धीरज धर, अभी दर्द कम हो जाएगा।

वो बोली: तू क्या कर रहा है? मुझे चोद रहा है?

मैं: ना, हम एक-दूज़े को चोद रहे हैं।

पारो: मुझे गर्भ लग जाएगा तो?

मैं: कब आई थी तेरी माहवारी?

पारो: आज-कल में आनी चाहिए।

मैं: तब तो डरने की कोई बात नहीं है। कैसा है अब दर्द?

पारो: कम हो गया है।

मैं: बाक़ी रहा लंड डाल दूँ अब?

वो घबड़ा कर बोली: अभी बाकी है? फिर से दुखेगा!

मैं: नहीं दुखेगा। तू सिर उठा कर देख, मैं हौले-हौले डालूँगा।

मैं हाथों के बल थोड़ा उठा। वो हमारे पेटों के बीच से देखने लगी। हल्के दबाव से मैंने पूरा लंड उसकी चूत में उतार दिया।

अब हुआ ये कि मेरी उत्तेजना बहुत बढ़ गई थी। दीदी के घर आ कर मूठ मारने का
मौक़ा मिला नहीं था। बड़ी मुश्किल से मैं अपने-आप को झड़ने से रोक पा रहा
था। ऐसे में पारो ने चूत सिकोड़ी। मेरा लंड दब गया। फिर क्या कहना?
दन-दना-दन धक्के शुरु हो गए, मैं रोक नहीं पाया। पारो की परवाह किए बिना
मैं चोदने लगा और आठ-दस धक्कों में झड़ पड़ा।

उसने पाँव लम्बे किए और मैं उतरा। उसने भोंस पर पैन्टी दबा दी। चूत से खून
के साथ मिला हुआ ढेर सारा वीर्य निकल पड़ा। बाथरूम में जाकर हमने सफाई कर
ली।

वो रोने लगी, मैंने उसे बाँहों में भर लिया, मुँह चूमा और गाल पर हाथ फिराया। वो मुझसे लिपट कर रोती रही।

मैं: क्यूँ रोती हो? अफ़सोस है मुझ से चुदाई की, इस बात का?

मेरे चेहरे पर हाथ फिरा कर बोली: ना, ऐसा नहीं है।

मैं: बहुत दर्द हुआ? अभी भी है?

पारो: अभी नहीं है, उस वक्त बहुत दर्द हुआ। मुझे लगा कि मेरी... मेरी...
चूत फटी जा रही है। लेकिन तू इतनी जल्दी में क्यूँ था? तेरा बदन अकड़ गया
था और तूने मुझे भींच डाला था। और तेरे ये.... ये... लंड कितना मोटा हो गया
था? क्या हुआ था तुझे?

मैं: इसे स्खलन कहते हैं। उस वक्त आदमी सबकुछ भूल जाता है और अद्भुत आनन्द महसूस करता है।

पारो: लड़कियों के साथ ऐसा नहीं होता?

मैं: क्यूँ नहीं। तुझे मज़ा नहीं आया?

पारो: तू चोदने लगा तो भोस में मीठी सी गुदगुदी होने लगी थी, लेकिन तू रुक गया।

मैं: अगली बार चोदेंगे तब मैं तुम्हें भी स्खलित करवाऊँगा।

पारो: अभी करो ना। देखो तेरा ये फिर से खड़ा होने लगा है।

मैं: हाँ, लेकिन तेरी चूत का घाव अभी हरा है, मिटने तक राह देखेंगे, वर्ना फिर से दर्द होगा और ख़ून निकलेगा।

मज़ा आने वाला है
नमस्ते दोस्तों

मेरा नाम शाम है। अब मैं आपको अपनी सच्ची कहानी बताने जा रहा हूँ। मैं गुजरात के एक शहर में रहता हूँ।

मेरा घर एक सरकारी कॉलोनी के पास है। मैं क़रीब २२ साल का था। तब मैंने
कॉलेज की पढ़ाई पूरी की और अभी कोई नौकरी पर नहीं लगा था। तब मैं और मेरे
दोस्तों ने मिलकर एक धंधा शुरु किया। जिसमें हम पास की सरकारी कॉलोनी, जहाँ
पर सभी लोग बाहर से रहने आते थे, उनको यह पता नहीं होता था कि इस शहर में
कौन सी चीज़ कहाँ मिलती थी, उन्हें हम उनके काम का सामान घर तक पहुँचवाने
का काम करते थे, और इससे अच्छी कमाई होती थी।

अब मैं कहानी पर आता हूँ।

वैसे तो मैं और मेरे दोस्त बड़े ही रोमांटिक थे और वहाँ की औरतें भी काफ़ी
सेक्सी होतीं थीं। मीना जो कि एक क्लास टू ऑफिसर की बीवी थी, उनकी शादी को
अभी कुछ ही महीने हुए थे। वह देखने में बहुत ही सेक्सी थी। उसकी फिगर
३४-२८-३८ होगी। ऊँचाई क़रीब ५.८ होगी। मेरी नज़र पहले दिन से ही उस पर थी।
ख़ास कर उसके चूतड़ों को देखकर मैं पागल ही हो जाता था। दिन में एक बार तो
किसी न किसी बहाने से उसके घर चला ही जाता था। बहाना न हो तो भी मैं 'कुछ
चाहिए', यह पूछने के बहाने चला जाता था। अक्सर उसका पति जो कि ऊँची पोस्ट
के कारण सुबह ९:३० को चला जाता था और शाम को देर से आता था। तब से मैं यह
ख़्वाब देखता था कब जा कर मैं इस को चोदूँ और हर रोज़ उस के ख्याल से मैं
मुठ मारता था।

एक दिन की बात थी जब मैं कुछ सामान देने के बहाने उनके घर शाम को गया तब घर
का दरवाज़ा खुला था। और मैं बिना थोक किए बिना ही घुस गया। मैंने देखा तो
मीना सिर्फ ब्रा और पैन्टी में ही थी और आईने के सामने बैठकर तैयार हो रही
थी। मुझे देख उसने कोई हरक़त नहीं की, ना ही अपने आप को ढँकने की, न ही
घबराई। और मैंने जैसे शर्म आ रही है, ऐसा नाटक करते हुए सॉरी कह कर घर से
बाहर जाने का उपक्रम किया।

उसने कहा- अरे तुम कहाँ जा रहे हो? तुम तो बड़े शर्मीले हो। क्या इससे पहले तुम ने कभी किसी औरत को इस तरह नहीं देखा है?

मैंने कहा- नहीं !

क्या तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है?

मैंने कहा- है ! लेकिन मैंने अभी तक उसके साथ कुछ भी नहीं किया।

तो उसने पूछा- क्यों नहीं किया।

अब धीरे-धीरे वह मेरे बहुत ही क़रीब आ गई। मैं समझ गया इसके इरादे कुछ ठीक
नहीं लगते। फिर मैंने भी मौक़े की नज़ाकत को जान के अपने एक हाथ को उसकी
जाँघ पर और दूसरे को उसके कंधे पर रख दिया। वो तो जैसे इसी के लिए तैयार
थी।

मैंने हिम्मत करके धीरे-धीरे उसकी चूचियों पर ब्रा के ऊपर से ही सहलाने
लगा। मैंने पूछा कि आईने के सामने बैठी थी, कहीं बाहर जाने वाली हो क्या?

तो वह बोली- मुझे पता था कि तुम इसी समय आते हो तो मैं तुम्हार ही इन्तज़ार कर रही थी।

तो मैंने पूछा- तुमको कैसे यह पता चला कि मेरी नज़र तुम पर है?

तो इस पर वह हँस कर बोली- एक दिन तुम्हें मेरे बदन घूर कर देखते हुए देख
लिया था ! तुम्हारे साहब रात को क़ाफी देर से आते हैं, हफ्ते में चार दिन
वह शराब पी कर आते हैं और बाकी उनको नौकरी की टेंशन रहती है तो हमारे बीच
में महीने में एक-दो बार ही सम्बन्ध बन पाते हैं। मैं कॉलेज के समय से ही
खूब चुदक्कड़ रही हूँ, मेरी चूत प्यासी रहे यह तो मुझसे सहन नहीं होता।
पहले दो महीने सामने वाले पटेल साहब का लड़का उसके साथ सेटिंग हुई, लेकिन
फिर वह विदेश पढ़ने चला गया। इतने में तुम आए और मेरी नज़र तुम पर पड़ी, तब
मैंने तुमसे चुदवाने का मन बना लिया था। लेकिन तुम मुझे कुछ इशारा ही नहीं
देते थे, इसीलिए आज मैंने तुम्हें खुला इशारा देने का मन बना लिया था।

यह कह कर वह मुझसे लिपट गई। मैं भी जैसे तैयार था। पहले मैंने उसकी ब्रा को
खोला और मेरे सामने थीं दो हरी-भरीं नारंगी। उसकी चूचियों की घुण्डियों का
रंग हल्का गुलाबी था और मैं बस उसपर टूट पड़ा। फिर उसने मेरे कपड़े उतारना
शुरु किया। अब हम दोनों पैन्टी-अन्डरवीयर में थे। हम दरवाज़ा बन्द करना
भूल गए थे।

उसने कहा- तुम अन्दर बेडरूम में जाओ, मैं दरवाज़ा बन्द कर आती हूँ।

मैं अन्दर रूम में पहुँचा, तब मैंने देखा कि रूम अच्छी तरह से सजाया था और कोने की टेबल पर सेक्सी तस्वीरों वाली पत्रिकाएँ थीं।

मैंने कहा- ये तुम पढ़ती हो?

"मैं अपनी दोस्त से पढ़ने के लिए लेती हूँ।"

"कौन सी दोस्त? वो मिसेज़ पटेल?"

तो उसने कहा "हाँ।"

"वह भी तुम्हारी तरह मस्त और सेक्सी है।"

"पहले मेरी प्यास बुझाओ फिर मैं उसके साथ तुम्हारी सेटिंग करवा दूँगी।"

अब उसने कमरे का ए.सी. चालू किया। फिर वह मेरे क़रीब आई और मेरे लंड को जो
कब से उसे देखकर बाहर आने को बेक़रार था को अन्डरवीयर के ऊपर से ही सहलाना
शुरु कर दिया। इसके बाद उसने उसे उतार दिया।

मेरा लंड जो कि ८" लम्बा और ३" मोटा था, उसे देखकर बोली "आज तक मैंने इतना
तगड़ा और लम्बा नहीं देखा है। आज तो बहुत मज़ा आने वाला है। आज मैं तुम्हें
वह सुख दूँगी जो तुम्हें सपनों में ही मिलता होगा।"

यह कह कर वो मेरा लंड अपने हाथ में लेकर उससे खेलने लगी, फिर उसे अपने मुँह
में लेकर लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी, साथ ही मेरे अंडकोष भी चाटने लगी।

मैंने कहा,"अब मुझसे रहा नहीं जाता, क्योंकि यह मेरा पहली बार है।"

"डार्लिंग यह तो शुरुआत है, आगे-आगे देखो होता है क्या!"

और वह घोड़ी बन गई और बोली,"बहुत दिन हो गए, मेरी किसी ने गाँड नहीं मारी। तुम मेरी यह तमन्ना आज पूरी करो।"

और सच में उसको जो पीछे से करने में जो मज़ा था वह अलग ही था। क़रीब १५
मिनट तक मैंने उसको पीछे से ही शॉट्स मारे। फिर वह सीधी हुई और मेरा मुँह
अपनी चूत के पास ले गई, और मैं उसे चाटने लगा। मेरा एक हाथ उसकी दाईं चूची
को दबा रहा था। अब हम 69 की मुद्रा में आ गए। वह काफी उत्तेजित हो चुकी थी
और मुझे ज़ोर-ज़ोर से चूम रही थी। मैं भी बहुत जोश में आ गया था।

अब उसने कहा कि अब मुझसे रहा नहीं जाता, चोदो मुझे।

फिर मैंने अपना लंड जो कि बहुत ही तड़प रहा था, उसकी चूत पर रख दिया और
धक्का दिया। मेरा ४" उसकी चूत में जा चुका था और वह सिसकियाँ लेने लगी। फिर
मैंने दूसरे धक्के में पूरा लण्ड उसकी चूत में डाल दिया। मुझे उसकी चूत की
गरमी का अहसास पागल बना रहा था।

अब मैंने थोड़ी रफ्तार बढ़ाई, तो उसने भी कहा- और ज़ोर से, और तेज़। बस मुझे चोद दो।

और मैं साथ-साथ उसके पूरे गोरे बदन का मज़ा ले रहा था। कभी उसके होंठ, तो
कभी-कभी उसकी चूची चूस कर। बस फिर क्या था, वह झड़ गई और मैंने भी कहा -
मैं भी झड़ने वाला हूँ !

उसने कहा- तुम अन्दर मत झड़ना, मैं तुम्हारा रस पीना चाहती हूँ। तब मैंने
अपना लंड उसकी चूत से बाहर निकाल लिया और उसके मुँह पर पिचकारी मारी, उसने
सारा पानी पी लिया।
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छोटे लंड से तसल्ली नहीं
मेरी उम्र है अठाईस साल। मैं एक
बच्ची की माँ भी हूँ, मैंने बी.सी.ए के बाद दो साल की एम.एस.सी-आई टी की,
मैं बहुत चुदक्कड़ औरत हूँ, स्कूल के दिनों से मैंने चुदाई का रस चख लिया
था, मैंने जिंदगी में कई लंड लिए, लेकिन बच्ची होने के बाद मेरी छोटे लंड
से तसल्ली नहीं हो पाती, मेरे पति मुझसे उम्र में काफी बड़े हैं, मैंने
उनके साथ घरवालों के खिलाफ जाकर शादी की थी, उनके पास बहुत पैसा था, मैं एक
साधारण से घर में पैदा हुई थी, हम तीन बहनें ही हैं, शौक पूरे करने के लिए
मैंने शुरु से अमीर लड़कों से चक्कर चलाये थे, पति का बिज़नस बहुत फैला हुआ
है, मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं। मैं और मेरे पति ही भारत में थे, इनके
दोनों भाई अमेरिका में बिज़नेस करते थे, सासू माँ वहीं रहती, ससुर भी !



शादी के बाद भी मैं चुदाई अपने पति तक ज्यादा देर सीमित नहीं रख पाई थी,
उम्र के फर्क की वजह से वो रोज़ रात को मुझे सुख नहीं देते थे, बिज़नस के
चलते शहर से बाहर, कभी देश से बाहर भी रहना पड़ता था, मेरी तन की आग नहीं
बुझती थी, घर से बाहर निकल कर किसी मर्द से इतनी जल्दी संबंध बनाना सही
नहीं था। इनका बहुत नाम था, काफी लोग इनको जानते थे, इसलिए डरती थी, इनको
भनक भी पड़ गई मुझे छोड़ ना दें, ऐशो आराम की जिंदगी से कहीं वो मुझे निकाल
ना फेंके, घर में कई नौकर थे।



एक दिन में अपने कमरे में खड़ी थी, तभी मेरी नज़र पिछवाड़े में पड़ी, हमारा
बावर्ची बनवारी लाल खुले में ताजे पानी से नहा रहा था, उसने सिर्फ अंडी
पहना हुआ था, पानी से चिपका पड़ा था, उभरा हुआ देख मेरी फुदी में खुजली
होने लगी, सोचा बाहर से अच्छा यही है कि सभी नौकरों को अलग अलग आजमा कर
देखूं, कोई तो सैट हो जाए तो घर में गंगा वाला काम होता।



नहाने के बाद उसने दोपहर का खाना बनाने आना ही था, हल्की गुलाबी जालीदार नाईटी काली ब्रा पैंटी ऊपर से खुली रख ली, लाबी में बैठ गई।



आज जब उसने मुझे देखा उसकी नज़र सर से पाँव तक गई, मैंने नशीली आँखों से
उसको देखा जब उसकी नज़रें मिली तो मैं होंठ चबाते हुए मुस्कुरा दी।



अनाड़ी तो वो था नहीं, मैं कमरे में आकर लेट गई, उसको मेरे पास आना ही था।
सर के नीचे बांह रख दरवाज़े की तरफ पिछवाड़ा करके एक साइड के बल लेट गई,
जांघों से ऊपर तक नाईटी उठा रखी थी, वो चाय लेकर आया, दरवाज़ा खटखटाया।



"आ जाओ !"



"मैडम चाय !"



"रख दो !"



"खाने में क्या बनाना है? साब आयेंगे दोपहर को?"



"नहीं, वो शायद रात को लौटेंगे, मेरा दिल नहीं है !"



मैं सीधी होकर लेटी, नाईटी जांघों तक उठा ली, मेरी पैंटी उसको साफ़ दिख रही थी।



"सुबह से तबीयत सही नहीं है, बदन दुःख रहा है !" मैंने अंगड़ाई लेने के बहाने से नाईटी आगे से खोल दी।



"फिर क्या बनाऊँ?"



उसकी नजर ब्रा में से झाँक रहे कबूतरों पर थी।



"क्या देख रहा है? जा ठंडी बीयर के दो मग बना !"



"क्या कह रही हो मैडम?"



"सही कह रही हूँ, बदन टूट रहा है, रात को तेरेसाब ने जोर देकर अपने साथ
स्कॉच पिला दी थी, पीकर खुद शराबी होकर सो गए, गर्म शराब गर्म शवाब को
जलाती रही !"



"आपके लिए बना देता हूँ !"



"नहीं दोनों के लिए !"



"कहीं साब आ गए तो वो मुझे नौकरी से निकाल देंगे !"



अंगड़ाई लेकर मैं बोली- सब दरवाज़े बंद कर ले, जल्दी से आ जा !



वो पांच मिनट बाद ट्रे में दो मग बना कर ले आया, मुझे पकड़ा कर अपना लेकर खड़ा था, बोला- मैं बाहर बैठ पी लूँगा।



मैंने पांच मिनट में मग ख़त्म किया, उसको आवाज़ लगाई- बनवारी, ख़त्म हो गई, दो और बना कर ले आ !



मैंने नाईटी उतार दी चादर लपेट कर बैठ गई।



"अपने लिए बनाया?"



"हाँ मैडम !"



मुझे सरूर सा होने लगा, मग की बजाए मैंने पजामे के ऊपर से उसके लंड को पकड़ लिया।



वो घबरा गया- मैडम, यह क्या? छोड़ दो?



मैंने कस के पकड़ लिया।



क्या करता? अगर हटता तो दर्द होता ! मुँह आगे करके पजामे के ऊपर से अपने होंठ रगड़े, हल्के से दांतों से काट भी लिया।



उसका तो दिमाग घूम गया कि यह सब?
मैंने कस के पकड़ लिया।



क्या करता? अगर हटता तो दर्द होता ! मुँह आगे करके पजामे के ऊपर से अपने होंठ रगड़े, हल्के से दांतों से काट भी लिया।



उसका तो दिमाग घूम गया कि यह सब?



उसको अंदेशा था, लेकिन इतनी जल्दी में इतना कर दूंगी, यह बनवारी ने नहीं सोछ होगा।



"इसको साइड टेबल पर रख दे ! कैसा मर्द है रे तू?"



मैंने चादर उतार फेंकी। मेरे गोरे जिस्म को काली ब्रा पैंटी में देख
बुड्डों के लुल्लों में जान आ जाती है, मैंने उसके पजामे के नाड़े को खींच
दिया। पजामा घिर गया, उसका अंडी फूलता जा रहा था, मैंने अंडी के ऊपर से चूम
लिया, धीरे से उसके अंडी की इलास्टिक को प्यार से नीचे सरकाया !



'उह !' उसका काला बड़ा सा आधा सोया लंड जो नर्वस होने की वजह से पूरा खड़ा नहीं हो रहा था, कुछ डर की वजह से !



"देख बनवारी, मर्द बन मर्द ! पूरा घर लॉक है, अपनी कसम तेरे साब शहर में ही नहीं हैं !"



बोला- मैडम, ड्राईवर तो गाड़ी लेकर आएगा, क्या समझेगा?"



"तेरा दोस्त है न वो?"



"हाँ !"



"फिर बातें भी खुलीं होंगी एक दूसरे से? एक कमरे में रहते हो, मैं बहुत प्यासी हूँ, कैदी की तरह हूँ यहाँ !"



"क्यूँ? साब का बिल्कुल ही खड़ा नहीं होता?"



"मुश्किल से होता है, सड़क पर चढ़ते ही पंचर हो जाता है !"



"आप दोनों की उम्र में कितना अंतर है? आपने शादी क्यूँ करी? पैसे के लिए ना? फिर एक चीज़ मिल जाए, उसके लिए कुछ कमी सहनी पड़ती है !"



मैंने उसके लंड को मुँह में लेते हुए कहा- अपनी चूतिया बकवास बंद कर, मेरे अंग अंग को चकनाचूर कर डाल !



हौंसला लेते हुए वो चप्पल उतार मेरे डबल बैड पर चढ़ आया, अपना कमीज़ उतार
फेंका, मुझे वहीं बाँहों में कस कर मेरे होंठ चूसने लगा साथ में ब्रा के कप
में हाथ घुसा मम्मा दबाने लगा।



"हाँ, यह हुई ना बात ! मसल डाल मेरे राजा ! अंग अंग ढीला कर दे अपनी मालकिन का !"



"हाय मेरी जान ! तेरे जैसी औरत को कौन मर्द चोदना नहीं चाहेगा ! मैं बस
डरता था, तेरी सूखती हुई ब्रा-चड्डी को बाहर देख हम मुठ मारते हैं !"



"हाय, सच्ची?"



"हाँ मेरी जान, सच्ची !"



उसने पीठ पर हाथ लेजा कर ब्रा उतारी, खींच कर मेरी कच्छी उतारी, मैंने उसको
धकेला और उसके लंड पर होंठ रख दिए, चूसने लगी। अब उसका लंड अपना असली रंग
पकड़ने लगा था, काला मोटा लंबा लंड देख मेरी तो फुद्दी में खलबली मच रही
थी। उसने भी मजे ले लेकर चुसवाना चालू कर दिया, साथ साथ उसने मेरे दाने को
रगड़ना चालू किया ! मैं पागल हो हो कर लंड चूस, चाट, चूम रही थी।



पति का अगर इतना चूसती तो मुँह में पानी निकल जाता, बनवारी मंझा हुआ खिलाड़ी
था, उसने अचानक से मेरी टांगें खोल दी, अपनी जुबां को मेरी फुद्दी पर
रगड़ने लगा, कभी घुसा कर घुमा देता तो मेरी जान निकल जाती !



मैंने कहा- एक साथ दोनों के अंग चाटते हैं राजा !



69 के एंगल में आकर मैंने उसके लंड को चाटना चालू किया तो उसने मेरी फुद्दी को !



मैं झड़ने लगी लेकिन उसका लुल्ला मैदान में डटा था, क्या औज़ार था उसका !



वो मुझे खींच कर बैड के किनारे लाया, खुद खड़ा होकर अपने बड़े लंड को घुसाने
लगा। कई दिन से ऐसा लंड न लेने से मेरी फुद्दी काफी कस चुकी थी, मुझे दर्द
हुई लेकिन उस दर्द में सच्चे मर्द की पहचान थी। देखते ही देखते उसका पूरा
काला लंड मेरे अंदर था और झटके दे रहा था, उसने किनारे पर ही मुझे पलटा,
फुद्दी पर थूका और घोड़ी के अंदाज़ में मेरी फुद्दी मारने लगा।



"वाह मेरे राजा वाह ! क्या मर्द है तू !"



"साली सुबह तेरी पैंटी देख मुठ मारी थी !"



जोर जोर से झटके लगाने लगा वो ! उसने मुझे लिटाया मेरी दोनों टांगें कंधों पर रखवा मेरे दोनों मम्मे पकड़ चोदने लगा। अब वो भी



मंजिल की तरफ था, इतनी तेज़ी से घिसाई हो रही थी मानो मशीन हो !



तभी वो शांत हो गया !



मुझे महीनों बाद मर्द का असली सुख हासिल हुआ था, पूरा जिस्म फूल की तरह हल्का हो गया था मेरा !



काफी देर मेरे होंठों चूमता रहा, फ़िर दोनों अलग हुए !



"अगर तेरे साब नहीं आये रात को तो आएगा?"



मिलने के वादे से बोला- हाँ, पर मनजीत को चकमा देना कठिन है !



"अगर चकमा न दे पाया तो दोनों के लंड खा जाऊँगी मैं ! मेरे अंदर मर्द के लिए इतनी भूख है !'



रात को पति नहीं आये, बनवारी रात का खाना बनाने आया, अब हम दोनों के बीच
जिस्मानी संबंध बन गए थे, उसने मुझे पहले बाँहों में लिया, मेरे होंठ चूसे,
मेरे मम्मे दबाने लगा, वहीं लॉबी में टेबल साइड कर गलीचे पर मुझे लिटा
चूमने लगा मैंने उसका लंड निकाला और चूसने लगी।



"बनवारी आज तुम भी खाना यहीं खाना, मंजीत भी आने वाला होगा !"



मैंने टांगें खोल दी, बनवारी समझ गया था, उसने अपना लंड घुसा दिया, झटके देने लगा।



"हाय ! और जोर से जोर से करो ! फाड़ डालो मेरी फुद्दी को !"



"तेरी बहन की चूत ! देख आज रात तेरा क्या करता हूँ ! ले मेरा पप्पू !"



"अह अह अह जोर जोर से चोद ! मेरे पालतू कुत्ते, आज रात तुम दोनों के गले में पट्टा डालूंगी ! बनाओगे मुझे अपनी मालकिन?"



"हाँ मेरी जान ! ले ले ले !" कह बनवारी ने मेरी फुद्दी अपने रस से भर डाली।



"यह क्या कर दिया? अंदर पानी क्यूँ निकाला?"



"तुम कौन सी कुंवारी लड़की हो? वैसे भी उससे तेरा पेट अब तक नहीं निकाला गया !"



बनवारी और में अलग हुए, वो खाना बनाने लगा।



बोला- मंजीत आ गया मेरी जान, उसको पटा ले गैराज में है अभी !



मैंने उसी पल तौलिया पकड़ा, पिछवाड़े में गई, ताज़े पानी में नहाने लगी,
सिर्फ ब्रा पैंटी में थी, उसके पाँव की आवाज़ सुन मैंने ब्रा का हुक खोल
दिया, पानी बंद कर साबुन जिस्म पर लगाने लगी, बड़े बड़े दोनों मम्मों पर
साबुन लगाने लगी।



जैसे वो आया, उसने लाइट का बटन दबाया, टयूब जलते उसके होश उड़ गए।



मैंने ऐसा शो किया कि मुझे उसके आने का पता नहीं लगा, दोनों बाँहों से मम्मे छुपा लिए।



"आप यहाँ?"



"क्यूँ? नहा नहीं सकती? क्या गर्मी थी? लाइट बंद कर दो मंजीत, कोई और भी
तुम्हारी मैडम को देख लेगा !" मैंने जल्दी से तौलिया लपेटा ना चाहते हुए
भी, उसी पल मुझे आईडिया आया, तौलिया तो लपेटा, मन में सोचा कि कहाँ मेरे
हाथ से निकल पायेगा, थोड़ा आगे जाकर में फिसल गई- आऊच ! सी मर गई ! अह !



मंजीत मेरी तरफ आया, मैंने तौलिया खिसका लिया। मैं संगमरमर के फ़र्श पर सीधी
लेटी थी। किस मर्द का हाल बेहाल ना होगा एक चिकनी हसीं औरत सिर्फ पैंटी
में, मेरी पहाड़ जैसी छाती पर निप्पल आसमान को निहार रहे थे।



उसने हाथ आगे किया, मैंने अपना हाथ उसके हाथ में दे दिया, उसने उस मालकिन
को नंगी खींचा जिस मालकिन की पैंटी को देख देख वो मुठ मारता था।



जैसे उसने खींचा, मैं उसकी बाँहों में थी, वो भी सिर्फ एक पैंटी में ! उसका एक हाथ मेरे चूतड़ों पर था एक पीठ पर !



मैंने दोनों हाथ उसकी पीठ पर लगा सर उसकी छाती पर टिका कदम बढ़ाया। उसका लंड
खड़ा हो चुका था, मेरे पेट पर चुभ रहा था, धीरे से बोली- बोलती क्यूँ बंद
कर ली? कहाँ रह गया तेरा जोश? जिस मैडम की पैंटी को सूंघ सूंघ कर मुठ मारता
है वो तो तेरी फौलादी बाँहों में लगभग पूरी नंगी है ! अंदर का मर्द ख़त्म
हो गया?



सुन कर वो हिल गया, उसके खड़े कड़क लंड पर प्यार से हाथ फेरा, फिर धीरे धीरे दबाने लगी।



यह देख उसका मर्द जाग गया था- मर्द तो मैडम हर पल जागा रहता है, मेरा थोड़ा
संकोच था, सेवक और मालकिन की हद के चलते ! उसने मेरे होंठ चूम लिए, मैंने
उसकी बाँहों से खुद को अलग किया, ठण्डे ठण्डे मार्बल पर लेट गई, मैंने
पैंटी को भी जिस्म से अलग कर दिया- ले पकड़, मेरे सामने सूंघ मेरी पैंटी !
ताज़ी ताज़ी महक मिलेगी क्यूंकि तुमसे लिपट कर पानी छोड़ रही थी !



"मैडम, आज तो जहाँ से महक निकलती है वो ही ढाई इंच की दरार सामने है !"



मैंने उसी पल टांगें फैला डाली- जो काम हो जाये वो ही अच्छा होता है ! मेरे राजा, लो ढाई इंच की दरार !



उसने अपने कपड़े उतारे, उसका लटक रहा था, जैसे मैंने अपने होंठ लगाये, वो खिल उठा, सलामी देने लगा- चूस दे जान !



मैंने काफी सारा थूक उसके सुपारे पर फेंका, उसका लुल्ला था, ना कि लुल्ली, इसलिए पूरा मुँह में कहाँ आता ! लंबाई ज्यादा थी, गप



गप की आवाज़ जैसी ब्लू फिल्मों की रंडी आम तौर पर करती हैं गंदी, गीली चुसाई !



वो मेरे लंड चूसने के अंदाज़ से पागल हुए जा रहा था।



"कभी किसी ने तेरा चूसा है?"



बोला- नहीं मैडम ! हमारी क्या किस्मत !



आज से तेरी हैसियत मेरी नज़रों में तेरे साब जैसी है, तेरी पुरुष अंग में कमाल का दावा है।
मेरी बहन गुँजन
मेरा नाम सुमीत है, पटना का रहने वाला हूँ। मैं जो यह कहानी बताने जा रहा हूँ यह बिलकुल सच्ची है।



पहले मैं अपने बारे में बता दूँ। मैं बहुत बड़ा चुदक्कड़ हूँ, मेरा लंड दस इन्च लम्बा है और चार मोटा।



बात है दिसम्बर की ! आज से सवा साल पहले की बात है। मैं पटना में अपनी बुआ के घर में था। और उनकी बेटी है गुँजन।



मेरे एक दोस्त ने बुआ की बेटी गुँजन को पटा लिया। इस बात की भनक मुझे लगी तो मैंने गुँजन को डांटा।



दूसरे दिन उसका बॉयफ्रेंड आकर बोला- तू गलत कर रहा है ! मैं उसे प्यार करता हूँ ! तू बीच में मत आ !



मैंने उसे भी मारा।



गुँजन बहुत सेक्सी है, जब भी मैं उसके बारे में सोचता तो उसको जमकर चोदने
का मन करता लेकिन मैं कुछ नहीं कर पाता। वो मुझे तिरछी नजर से देखती थी।



बस तो सर्दियों के दिन थे। सब लोग (परिवार वाले) रजाई ओढ़ कर रात को बातें
करते थे। वो मेरी बगल में बैठ गई। मैने धीरे से उसकी टांग पर हाथ फ़ेरना
शुरु किया। वो मेरी तरफ़ देख के मुस्कराई तो मुझे हरी झण्डी मिल गई। मैने
उसके वक्ष पर हाथ लगाया और उसके स्तन दबाने शुरु किये। वो मस्त हो रही थी।



वो कहने लगी- मुझे कम्प्यूटर सिखाओ !



मैने कहा- क्लास लगेगी, वो भी रात को !



वो कहने लगी- ठीक है, मैं डिनर करके आपके कमरे में आ जाऊँगी।



वो रात को मेरे कमरे में आई। घर बहुत बड़ा था। मैंने उसे कम्प्यूटर ऑन करके
दिया, उसको गाने चलाना, सीडी चलाना बताने लगा। मैं उसको बताते हुए छू रहा
था। उसे अजीब सी मस्ती चढ़ रही थी। उसका ध्यान मेरी ओर हो गया। मैं सेक्सी
फ़िल्म पर क्लिक करके सोने का नाटक करने लगा। उसने वो फ़िल्म एकदम डर के बंद
कर दी और फ़िर कुछ देर तक वो कम्प्यूटर चलाने के बाद सोने को जाने लगी।
लेकिन उसका मन उस फ़िल्म को देखने का था तो उसने मेरी ओर देखा तो मैं सोने
का नाटक करने लगा। वो आराम से फ़िल्म देखने लगी।



फ़िल्म देखने के बाद वो गर्म हो गई। वो अपने वक्ष को मसलने लगी। मैंने धीरे से उसको चूम लिया तो वो चौंक गई।



मैं उसे अपने बिस्तर पर उठा लाया तो वो बोली- भैया यह क्या कर रहे हो?



मैंने कहा- जो तुम्हें चाहिए, वो दे रहा हूँ।



मैं उसकी चूचियाँ दबाने लगा, वो मस्त होती जा रही थी। मैं होंठ भी चूमने लगा।



वो बोली- यह नीचे एक डंडा सा क्या है?



इतने में उसने मेरे लंड पर हाथ फ़ेरना शुरु किया। मुझे भी मस्ती चढ़ रही
थी। मैंने धीरे से उसकी सलवार को खोल दिया, मैं सलवार को उतारने लगा तो वो
बोली- किसी को पता चल गया तो?



मैंने कहा- तुम बताओगी?



वो बोली- नहीं।



मैने उसके और अपने सारे कपड़े उतार दिये। हम दोनो एकदम नंगे थे। मैं उसे
बेसबरी से चूम रहा था। वो भी मुझे 'चूमते रहो' कह रही थी, इतने दिन पहले
क्यों नहीं किया।



मेरा दस इन्च का लंड एकदम खड़ा था। वो बेसबरी से उसे देखने लगी ओर बोली- इतना बडा पहली बार देखा है।



वो एकदम नंगी मस्त दिख रही थी, उसकी छोटी छोटी चूचियाँ पूरी कसी हुई थी।
मैने पहली बार उसे नंगी देखा था। मैं उसकी चूचियाँ चूसने लगा। वो मस्त हो
कर तडफ़ रही थी। मैं उसके पूरे शरीर को चूमता हुआ उसकी चूत को चूसने लगा।
बाद में हम लोग 69 की अवस्था में हो गये। वो मेरे लण्ड को चूस रही थी, मैं
उसकी गोरी साफ़ चूत को जीभ से चूस रहा था।



आ.आ..आआया.आआआआआअ..आआआ..उ.ऊउऊ.ऊ.ईई.ऊई..ऊई आह आआह्ह्छ- वो मस्त हो रही थी।



अब मैं झड़ने वाला था, वो भी इस दौरान दो बार झड़ गई थी। मैं उसका नमकीन रस
पीता रहा।मेरा रस उसके मुँह में झड़ गया। वो सारा रस मस्ती से पी गई।



अब मैं फ़िर उसकी चूचियाँ चूसने लगा। वो बहुत खुश थी। मैने एक उँगली उसकी चूत में डाली। मेरा लण्ड खड़ा हो गया।



अब वो बोली- मुझे कुछ हो रहा है, जल्दी करो, मेरी प्यास बुझाओ।



मैने कहा- इतनी भी जल्दी क्या है?



मैने कहा- दर्द बहुत होगा ! झेल लोगी?



वो बोली- चाहे मेरी चूत फ़ट जाये, मैं चाहे जितना भी चिल्लाऊँ, छोड़ना मत, बस अब जल्दी करो, चोद डालो, फ़ाड डालो मेरी चूत, जल्दी करो।



मैंने चूत पर लंड रखा और धक्का दिया तो लंड 4" अंदर ही गया था कि वो चिल्लाने लगी- छोड़ दो, बस करो, मर जाऊँगी।



मैने एक जोर से झटका मारा और मेरा लण्ड चूत की सील तोड़ते हुए अंदर घुस गया।
वो चिल्लाती रही, मैं रुक गया और उसके चुचूक चूसने लगा। वो मस्त हो रही
थी। थोड़ी देर में मैंने झटके लगाने शुरु किये। वो भी मेरा साथ देने लगी थी।
वो चूतड़ उठा उठा कर चुद रही थी। काफ़ी सारे झटके लगाने के बाद मैं झड़ गया,
इस दौरान वो तीन बार झड़ चुकी थी।



पूरी रात में लगभग 5 बार चोदा। वो अब पूरी तरह से टूट चुकी थी। उससे उठना ही मुश्किल हो गया था।
MAST KAHANI HAI
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